01-03-2019

28 - विदेशी बहू

सुधा भार्गव

26 जून 2003 
विदेशी बहू

भार्गव जी को हल्की सी डायबिटीज़ है। ख़ूब घूमते-फिरते हैं पर कभी कभी बदपरहेज़ी कर ही लेते हैं। 

एक दिन बहू शीतल बड़ी गंभीरता से बोली, "मम्मी जी आप पापा जी को हर दो घंटे बाद खाने को दिया करें। यदि एक समय ज़्यादा या नुक़सान देने वाली चीज़ खाने लगें तो मना कर दें।"

"बेटी, मैं एक बार कहती हूँ दुबारा नहीं। यदि उसका मोल नहीं समझा जाता तो मुझे बुरा लगता है।"

"अरे मम्मी जी, अपनों का कोई बुरा माना जाता है। यदि कुछ अनहोनी हुई तो सबसे ज़्यादा आपको ही सहन करना पड़ेगा। आपके बेटे अगर कोई ग़लत काम करेंगे तो मैं बार–बार टोकूँगी चाहे उनको कितना ही बुरा लगे।" 

मैं चुप आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बातों की गहराई में डुबकी लगा रही थी। कौन कहता है नई पीढ़ी बुज़ुर्गों का ध्यान नहीं रखती। शायद समझने में ग़लती हुई है बड़ों से। 

यह वही शीतल है जिसे मेरे बेटे ने ख़ुद पसंद करके अपना जीवन-साथी चुना था। जब उसने अपने निर्णय की सूचना मुझे दी तब मैं भारत में थी और वे दोनों एडमंटन (Edmonton) में। माँ-बाप की ख़ुशी तो बच्चों की ख़ुशी में है सो हम मिया-बीबी ने तुरंत सहमति दे दी। दूसरे मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि वह जो भी क़दम उठाएगा सोच समझकर उठाएगा। लेकिन संशय की दीवार सिर उठाने से बाज न आई। सोचने लगी-विदेश में रही व पढ़ी-लिखी लड़की हम बड़ों को सम्मान दे पाएगी या नहीं! सो पूछ लिया फोन पर ही - "बेटा, मेरी होने वाली बहू सुबह उठकर एक प्याला चाय तो दे देगी?” 

"हाँ माँ,उससे भी ज़्यादा।" 

सच, शीतल से जितनी मान-सम्मान मिला उसकी उम्मीद न थी। माँ बनने पर वह मेरे पोती-पोते को ज़रूर अच्छे संस्कार देगी। 

क्रमश:-

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