एम. एस. सी. के आठवें पेपर यानी प्रोजेक्ट के लिए उसे दिन रात एक करना पड़ा। वेब साइट से बहुत कुछ डाउन लोड किया, पढ़ा, समझा। लैब में बारह-बारह घंटे की सिटिंग दी। जूनियरज़ की चिरौरी करते उन पर एक्सपेरिमेंट किए। ढेरों प्रेज़ेंटेशनज़ बनाए। टाइपिंग, प्रेज़ेंटेशनज़, बार-बार एडिटिंग - बस एक ही इच्छा थी-काम सुपर हो।

प्रोजेक्ट की शोधपत्रात्मक सी.डी. भी बनाई गई। डॉ. गिल उसे अमेरिका भेज रहे हैं - मेरे रिसर्च पेपर को....... ऐसा एक्साइटमेंट.....। पहला नाम डॉ. गिल का, दूसरा मेरा यानी रिसर्चर का। जब डेढ़ वर्ष बाद पुस्तकालय में देखा तो पेपर तो वही था, पर उसपर नाम अध्यक्ष डॉ. राने और गाइड डॉ. गिल का था और जब अवार्ड की घोषणा हुई, तो लेने डॉ. राने गए। अख़बारों में उनका ही नाम था। टी.वी. में उनकी ही न्यूज़ थी। प्रेस रिर्पोटरों को वही अपने कठिन परिश्रम के हवाले प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर दे रहे थे।

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