पिछले आठ दिनों से मेजर एक मिनट के लिए भी सोये नहीं थे। बस ग्रेसी के पलंग के पास या उसके रूम के बाहर गलियारे में कुर्सी पर बैठे रहते। आज ग्रेसी की हालत बहुत नाज़ुक थी। डॉक्टर सुबह से ही उसके इलाज में जुटे हुए थे।

बारिश में भीगते हुए लगातार आठ दिन तक रात-दिन ग्रेसी मेजर के साथ जंगलों में आतंकवादियों द्वारा छुपाई हुई विस्फोटक सामग्री ढूँढ़ती रही थी। डॉग्स तो दूसरे भी थे लेकिन ग्रेसी की सूँघने और भाँपने की शक्ति बहुत तेज़ थी। कुल बारह किलो सामग्री उसने पकड़वाई वरना जानमाल का न जाने कितना बड़ा नुकसान होता। विस्फोटों की बहुत बड़ी साज़िश को ग्रेसी ने नाकामयाब करके देश को बड़े संकट से बचा लिया। आख़िरी विस्फोटक की सूचना देने के साथ ही उसे पक्षाघात हुआ और वो बेहोश हो गई, तबसे वह 109 डिग्री बुखार में जीवन-मृत्यु के बीच झूल रही है।

"बेहोश होने से पहले भी उसने आख़िरी एक्सप्लोसिव पकड़वा ही दिया, मैं तो पाँव रखने ही वाला था वहाँ पर लेकिन ग्रेसी ने मेरी यूनिफ़ॉर्म खींचकर मुझे आगाह कर दिया। वरना आज मैं ज़िंदा न होता। उसने देश के प्रति अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी," मेजर अपने साथी कमांडो अर्जुन से बोला।

"अद्भुत थी उसकी समझ। दुःख बस यही है कि इंसान तो ज़मीन, धन या सत्ता की लालच में ख़ून-ख़राबा और लड़ाईयाँ करता है लेकिन ये मूक पशु बेचारे....
"ये निर्दोष बेवजह इंसानों की ख़ूनी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ते हैं," अर्जुन दुखी स्वर में बोला।

"इन बेचारों को पता भी नहीं होगा कि क्यों इन्हें बारिशों में भीगना पड़ता है, जानलेवा विस्फोटकों को ढूँढ़ने में अपनी जान ख़तरे में डालनी पड़ती है या कभी चली भी जाती है। न उन्हें नाम का लालच न धन का, न पद का," मेजर ने  टूटते स्वर में कहा।

तभी ग्रेसी के कमरे से निकलते हुए डॉक्टर ने उसका कन्धा थपथपाते हुए बताया कि ग्रेसी नहीं रही।

"मनुष्य के स्वार्थ पर न जाने कब तक मूक पशु बलि चढ़ते रहेंगे।"

और ग्रेसी की मौत पर मेजर और अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।

0 Comments

Leave a Comment