मैं छत से नीचे आया और पूछा, "माँ सामान पैक हो गया है?"

माँ ने कहा, “विनय बेटा सब रख दिया है। तुम्हारे कपड़े, रोज़मर्रा की चीज़ें, घी अचार। "

मैं बोला, "अरे माँ तुम ने घी, अचार यह सब क्यों पैक कर दिया?”

माँ ने जवाब दिया, "कोई बात नहीं बेटा लेते जाओ।” 

“अरे माँ तुम्हें पता नहीं है बेंगलुरु में इन चीज़ों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”

माँ ने प्यार से सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "कोई बात नहीं बेटा जब तुम खाने के साथ इन सब चीज़ों को रखोगे तो मेरी याद आ जाएगी।” इतना कहते ही माँ की आँख में आँसू आ गए। 

मैंने कहा, "माँ तुम क्या बात करती हो। तुम्हें याद करने के लिए मुझे इन सब चीज़ों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।” 

माँ चिंतित स्वर में बोली, "बेटा तुम पहली बार बनारस से बेंगलुरु नौकरी के लिए जा रहे। इतना बड़ा शहर है। पता नहीं तुम कैसे रहोगे?” 

मैंने कहा, "हाँ मुझे पता है क्लास फ़र्स्ट से इंजीनियरिंग तक की पढ़ाई मैंने बनारस में रहकर पूरी की है। और माँ आज तक मैं तुम लोगों के बिना न रहा हूँ ना ही कहीं गया हूँ। पर माँ नौकरी लिए तो हमें शहर से बाहर निकलना ही पड़ेगा।”

सर पर हाथ फेरते हुए माँ ने कहा, "हाँ बेटा पता है बेंगलुरु में अपना ख़्याल रखना।”

“ठीक है माँ,” ये कह कर मैं अपने मित्रों से मिलने बाहर चला गया। 

रात को खाना खाने के बाद मैंने अपना सामान चैक किया और जाकर अपने कमरे में बेड पर लेट गया। जैसे ही मैंने आँखें मूँदी बचपन से लेकर आज तक का समय उसके मानस पटल पर अंकित हो गया। बचपन से लेकर आज तक माँ ने अपनी ममता और पिता ने अपना कर्तव्य मेरे प्रति बख़ूबी निभाया है। उसे बैंग्लोर में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने के लिए जाना पड़ रहा है। पता नहीं कैसी जगह होगी? उसके मन में संदेह हुआ, ठीक ढंग से अपनी नौकरी कर पाऊँगा कि नहीं। वहाँ का रहन-सहन कैसा होगा? वहाँ का खाना पीना कैसा होगा? बस इसी कशमकश में मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। रोज़ की तरह सुबह माँ ने आवाज़ दी, "बेटा सो कर उठ जाओ। बेंगलुरु जाना है। " मैं तुरंत ही बिस्तर पर से उठ गया। 

पापा मम्मी ने मुझे बनारस एयरपोर्ट तक विदा किया। शाम को बेंगलुरु एयरपोर्ट से मैंने होटल के लिए एक टैक्सी ली। होटल में मुझे 50 और लड़के-लड़कियाँ भी मिले। जो मेरी ही तरह जॉब करने उसी कंपनी में आए थे। दूसरे दिन जब वह सब कंपनी में पहुँचे तो उनका स्वागत हुआ और सभी ने अपनी अपनी नौकरी की शुरुआत की। कह सकते हैं कि सभी ने अपनी दूसरी यात्रा आरंभ की। सभी के मन में नौकरी को लेकर एक नया उत्साह था पर किसी को नहीं पता था कि इस यात्रा का अंत कहाँ है। 

दूसरे दिन सुबह से मेरी ऑफ़िस की 6 महीने की ट्रेनिंग शुरू हो गई। मैंने कंपनी में अपने ही साथ काम करने वाले एक लड़के सुधीर के साथ रूम शेयर करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे ऑफ़िस का काम बदस्तूर चलने लगा। एक दिन मैं बैठा अपने केबिन में काम कर रहा था तभी अचानक पीछे से एक लड़की ने आवाज़ दी। मैं झटके से मुड़ा तो देखा मेरे साथ काम करने वाली एक लड़की मोनिका खड़ी थी। मैंने कहा, "हाँ, बोलो क्या बात है?”

मोनिका ने कहा, "आज मेरा जन्मदिन है।” 

मैंने बधाई दी, "जन्मदिन मुबारक हो।” 

मोनिका ने नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा, "ऐसे ही मुबारकबाद देते हैं किसी को?”

मुझे उसकी बात समझ में नहीं आई। 

“अरे यार कम से कम हाथ मिलाकर मुबारकबाद देते।”

शर्माते हुए मैंने हाथ मिलाया और बोला, "मोनिका जन्मदिन मुबारक हो!” 

“धन्यवाद।” फिर मोनिका बोली, "मैं तुमको आज शाम की पार्टी के लिए निमंत्रण देने आई हूँ। मैंने एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया है। तुम सादर आमंत्रित हो।”

मैंने बोला, "अच्छा ठीक है।”

इसके बाद मोनिका एक मुस्कुराहट बिखेर कर वहाँ से चली गई। उसके जाने के बाद कुछ समय के लिए मेरा मन मोनिका की तरफ़ चला गया। मोनिका एक धनी परिवार से ताल्लुक रखती थी और दिल्ली की रहने वाली थी। उस समय वह शुद्ध भारतीय परिवेश में थी और बहुत ख़ूबसूरत और शालीन लग रही थी। ऑफ़िस में काम करने वाली और लड़कियों से बिल्कुल अलग। इसलिए शायद मेरा ध्यान बार-बार उसकी तरफ़ चला जाता था। मैंने अब तक लड़कियों से कोई ख़ास मेलजोल नहीं बनाया था। पर हर लड़के की किसी लड़की को लेकर एक ख़ास कल्पना होती है। मैं मोनिका को काफ़ी हद तक अपनी कल्पना के रूप में देखता था। वो भारतीय परिवेश का पहनावा, वो चेहरे पे लटके खुले बाल, वो दिल को सुकून पहुचाने वाली मुस्कुराहट। तभी वेटर ने आकर मेज़ पर चाय रख दी और मेरा ध्यान मोनिका से वापस आ गया। 

जब मैं और सुधीर मोनिका की पार्टी की तरफ़ चले हम तो शायद सबसे पहले ही पहुँचे थे। अभी मोनिका भी नहीं आई थी। धीरे-धीरे पार्टी में सारे लोग इकट्ठे होने लगे। अचानक मोनिका ने होटल में प्रवेश किया। मोनिका बिल्कुल अलग लग रही थी। जैसे मेरे मन में उसकी छवि थी उसके बिल्कुल विपरीत। उसने वेस्टर्न स्टाइल का ड्रेस पहनी हुई थी और चेहरे पर भारी मेकअप था। उसने प्रवेश करते ही सब का अभिवादन किया। 

अब सब एक बड़े मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे गए। केक काटने की प्रक्रिया के बाद वेटर ने ड्रिंक सर्व करना शुरू किया। मैंने महसूस किया कि मुझे छोड़कर किसी और ने सॉफ़्टड्रिंक का ग्लास नहीं पकड़ा है। 

मोनिका मेरे पास आई उसके हाथ में भी हार्ड ड्रिंक का ग्लास था। उसने मुझसे पूछा, "तुम कुछ क्यों नहीं ले रहे हो?”

मैंने कहा, "नहीं मैं हार्ड ड्रिंक नहीं पीता। 

मोनिका ने हँसते हुए कहा कोई भी आदमी कोई भी चीज़ पहली बार करता है। वो मेरे पास से चली गई। मुझे थोड़ी सी शर्मिंदगी महसूस हुई। 

मैं सबको घूर रहा था और इस टाइप की पार्टी का अनुभव कर रहा था। जैसे-जैसे समय बढ़ता जा रहा था सब पर नशा हावी होता जा रहा था। सभी लड़के-लड़कियाँ अपने आप में मस्त होकर पार्टी का इंजॉय कर रहे थे सिवाय मेरे। मैं चुपचाप लोगों को देख रहा था और अंततः पार्टी रात के डिनर के साथ समाप्त हुई। सब अपने-अपने घर को जाने लगे किसी से भी ढंग से चला नहीं जा रहा था । पर सभी सब प्रकार की चिंताओं से मुक्त लग रहे थे। 

जैसे ही मैं चलने को हुआ मोनिका ने नशे में मेरा हाथ पकड़ा और बोली, "विनय इस वक़्त मैं बहुत नशे में हूँ, कृपया मुझे मेरे घर तक छोड़ दोगे।”

एक बार को तो मैं थोड़ा सा हिचकिचाया पर फिर मैंने कहा, "अच्छा चलो।”

मैंने महसूस किया कि मोनिका से नशे की वजह से नहीं चला जा रहा था। मैंने होटल के बाहर एक टैक्सी रोकी और ड्राइवर को मोनिका के पते पर ले चलने के लिए कहा। 

मोनिका ने नशे की हालत में कहा, "लगता है तुम्हें मेरी पार्टी पसंद नहीं आयी। 

मैंने कहा, "नहीं ऐसी बात नहीं है। वास्तव में इस तरह की पार्टी मैंने कभी ज़िंदगी में देखी नहीं तो मैं आनंद कैसे लेता।"

इसके बाद मोनिका अपना सर मेरे कंधे पर रख कर सो गई थी। मैंने मोनिका को उसके घर छोड़ा और अपने घर वापस आ गया। मैं बेड पर लेट गया और सोचने लगा पार्टी के बारे में। ज़माना तेज़ी से भाग रहा है पता नहीं इस प्रकार की संस्कृति में रह पाऊँगा या छोड़कर भाग जाऊँगा। पर इतना अवश्य था कि मेरे मन में मोनिका को ले कर जो अब तक की छवि थी उससे मुझे बहुत धक्का लगा था। मैंने अपने आपको समझाया, इसमें मोनिका की कोई ग़लती नहीं है। शायद ग़लती मेरी है मैं आज के समाज के हिसाब से बहुत धीमा हूँ। इसी कशमकश में मेरी कब आँख कब लग गई मुझे पता ही नहीं लगा। दूसरे दिन शाम को मोनिका का फोन आया। 

मैंने मज़ाक में पूछा, "नशा उतरा कि नहीं?” 

मोनिका ने भी हँसते हुए कहा, "मेरा… मेरा तो नशा उतर गया पर कभी-कभी तुम भी नशे में आना सीख लो।" उसने मुझे कल रात के लिए धन्यवाद दिया। 

मैं मुस्कुराया, "हाँ... अब मुझे लग रहा है तुम्हारा नशा उतर गया।” 

समय बीतने लगा हम लोग ऑफ़िस में परमानेंट इंप्लाई की तरह काम करने लगे पर इस दौरान मोनिका से मेरी बातचीत में काफ़ी इजाफ़ा हुआ। पर हमारी सारी बातचीत ऑफ़िस में खाली समय में मिलने तक ही सीमित थी। इस दौरान मैंने महसूस किया कि मोनिका का व्यवहार मेरे प्रति काफ़ी दोस्ताना हो गया है। धीरे-धीरे एक साल बीत गया। इधर बीच मेरी सैलरी काफ़ी बढ़ गई तो मैंने उस पैसे से बाइक खरीद ली या पैसे बढ़ने के साथ मेरी ज़रूरतें भी बढ़ने लगीं। घर से ऑफ़िस मैं बाइक से आने-जाने लगा। इसका मुझे फ़ायदा यह मिला कि मैं कभी-कभी शाम को लौटते वक़्त मोनिका को उसके घर तक छोड़ देता था। 

एक दिन ऑफ़िस से निकलने में काफ़ी देर हो गई। 

उस दिन मोनिका ने मुझसे कहा, "विनय रात को काम ख़त्म होने के बाद इकट्ठे ऑफ़िस से निकलते हैं।” 

मैंने कहा, "ठीक है मैं तुम्हें ड्रॉप कर दूँगा।” 

मैंने मोनिका को उसके घर ड्रॉप किया। 

मोनिका ने मुझे रोकते हुए कहा, "विनय आज रात का खाना बाहर से मँगा लेते हैं। तुम भी खाना मेरे साथ खाने के बाद अपने घर चले जाना।"

मोनिका ने खाने का आर्डर कर दिया । उसने मुझसे मुस्कुराते हुए पूछा, “ विनय अभी खाना आने में एक घंटा लग जाएगा; तब तक तुम कुछ लेना पसंद करोगे। ऐसा करती हूँ तुम्हारे लिए जूस लाती हूँ।”

पता नहीं क्या बात थी मुझे भी तो ताव आ गया। 

मैंने भी जोश के साथ कहा, "आज मैं वही लूँगा जो तुम लोगी।” 

बस फिर क्या था हार्ड ड्रिंक की महफ़िल जम गई। धीरे-धीरे हम दोनों पर नशा हावी होता गया। खाना खाने के बाद रात में मैं मोनिका के ही घर सो गया। सुबह जब नींद खुली तो मेरा सर बहुत भारी था। मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार हार्ड ड्रिंक का सेवन किया था। थोड़ी देर बाद मोनिका मेरे लिए सुबह की चाय लेकर आई तो मैंने औपचारिकता बस कहा, "मुझे माफ़ कर दो। कल रात मुझ पर नशा इतना हावी हो गया था कि मैं उठकर अपने घर तक नहीं जा पाया।" 

मोनिका ने कहा, "माफ़ी किस बात की, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।" बस फिर क्या था यह सिलसिला आगे बढ़ता ही चला गया। हर वीकेंड पर मैं और मोनिका साथ ही शाम को आने लगे और मैं भी धीरे-धीरे बनारस की आबो-हवा को भूलकर बेंगलुरु की आबो-हवा 
में घुलने लगा। एक दिन नशे में मैंने मोनिका से कहा, "मोनिका मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और शादी करना चाहता हूँ।" 

मोनिका चौंकी, "मुझसे प्यार करते हो यह बात तो समझ में आती है लेकिन इसमें शादी की बात कहाँ से आ गई? अभी हम नशे में हैं; कल बात करते हैं।” 

मैंने कहा, "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।"

दूसरे दिन उसके घर से निकलते ही मैंने उसके सामने यह बात दोबारा दोहराई। 

उसने कहा, "विनय मैं अभी शादी नहीं करना चाहती हूँ। अगर तुम चाहो तो हम लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं।"

मैंने कहा, "अच्छा ठीक है आज शाम को सोच कर बताता हूँ।" मैंने इस बारे में बहुत विचार किया कि किसी लड़की के साथ रहना है वो भी बिना शादी के। घर में पता लगेगा तो वह क्या सोचेंगे मेरे बारे में? पर पता कैसे लगेगा? मोनिका के प्रति मेरी चाहत इतनी ज़्यादा थी कि मैं इस अवसर को मना नहीं कर पाया। मैं और मोनिका एक साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। 

धीरे-धीरे समय बीतता गया। इधर बीच मेरी मेहनत की वजह से मेरी सैलरी बढ़ती चली गई। इसी मैंने बैंक से लोन लेकर एक बड़ी कार खरीद ली। अब मैं और मोनिका उसी कार से ऑफ़िस आने-जाने लगे। 

एक दिन मोनिका ने मुझसे कहा, "विनय अब हम लोगों को लिव-इन रिलेशनशिप में रहते काफ़ी दिन हो गए हैं; अब हम लोगों को शादी के बारे में सोचना चाहिए। पर हम लोग शादी से पहले एक घर खरीद लें तो कैसा रहेगा?” मैंने बिना सोचे-समझे कहा, "मोनिका तुम चिंता मत करो। घर के बारे में पता करता हूँ।"

बस फिर क्या था, थोड़े ही समय में भारी ब्याज पर बैंक से लोन ले लिया और घर खरीद लिया। थोड़े ही समय में हम लोग अपने घर में शिफ़्ट। हो गए अब हमने जल्दी ही शादी करने का फ़ैसला किया। मुझे अभी यह महसूस होने लगा था कि सब कुछ ठीक हो गया है पर मेरी सोच ग़लत थी। 

एक दिन जब हम ऑफ़िस पहुँचे तो ऑफ़िस के हेड ने हम सब की एक तुरंत मीटिंग बुलाई और कहा इस समय मार्केट की स्थिति ठीक नहीं है। हमारे ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं अतः कंपनी ने यह फ़ैसला किया है कि कुछ इंप्लाई नौकरी से निकाले जाएँगे। शुक्रवार को निकाले गए इंप्लाई की लिस्ट लगा दी जाएगी। उन्हें दो महीने की सेलरी एडवांस में दी जाएगी, इसके बाद उन्हें ऑफ़िस आने की ज़रूरत नहीं है। यह सुनकर सारे इंप्लाई के चेहरे उतर गए। मेरी तो जैसे दिल की धड़कन बढ़ गई। मैं और मोनिका एक दूसरे को देखने लगे। मीटिंग बर्ख़ास्त हुई। मैं सीट पर जाकर बैठ गया। मैंने सोचा अगर मेरा नाम लिस्ट में हुआ तो नौकरी तो आज नहीं कल दूसरी मिल जाएगी पर बैंक का लोन मैं कैसे चुकता करूँगा? कैसे मेरा गुज़ारा बेंगलुरु में होगा? ऐसे में तो शादी का ख़्याल मेरे ज़ेहन से उतर ही गया। 

भी पीछे से आकर मोनिका ने आवाज़ दी, "विनय क्या हुआ?” 

मैंने कहा, "मैं सोच रहा हूँ अगर लिस्ट में मेरा नाम हुआ तो क्या होगा?”

मोनिका बोली, "अरे घबराते क्यों हो। मेरे पास अभी काफ़ी सेविंग है अगर हम दोनों में से एक की भी नौकरी बच गई तो बेंगलुरु में रहने की समस्या हल हो जाएगी।”

मोनिका की बातों से मुझे काफ़ी बल मिला पर चिंता से काफ़ी व्यग्रता थी। और मैं शुक्रवार को आने वाली लिस्ट का इंतज़ार करने लगा। फिर वह मनहूस दिन आ गया मेरा नाम लिस्ट में था। पर मोनिका कि नौकरी बच गई थी। दो महीने की अग्रिम सैलरी के साथ मैं भारी मन से ऑफ़िस से घर को लौट आया। 
थोड़ी देर बाद मोनिका घर आयी और बोली, "विनय चलो आज कहीं बाहर चलते हैं। तुम्हारा मन थोड़ा हल्का हो जाएगा और हाँ, तुझे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी और सब ठीक हो जाएगा।”

मैं जानता था इतना आसान नहीं है। दूसरे दिन मैंने अपने बायोडाटा प्लेसमेंट एजेंसी को फ़ॉरवर्ड कर दिया पर किसी भी प्लेसमेंट एजेंसी से मुझे अच्छा रिस्पांस नहीं मिला। सबने यही कहा इस वक़्त मार्केट बहुत ख़राब है। आपको ठीक नौकरी मिलने में समय लग सकता है। मेरी नौकरी जाने की चिंता, ऊपर से बैंक की भारी ब्याज दर; मैं उदास मन से घर लौट आया। 

धीरे-धीरे एक महीना बीत गया मुझे नौकरी के लिए कहीं से भी कॉल नहीं आई। मोनिका सुबह ऑफ़िस चली जाती थी और मैं घर में बैठे-बैठे इंटरव्यू की कॉल आने का इंतज़ार करता रहता था। समय के साथ मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। जो मेरी थोड़ी सी शेविंग बची थी वो बैंक की किश्त में जा रही थी। अब हालत यह हो गई कि मैं मोनिका के पैसे पर निर्भर रहने लगा। 

एक दिन मैंने मोनिका से कहा, "हो सकता है मुझे अच्छी जॉब मिलने में कुछ और समय लग जाए। ऐसा करते हैं कार और घर बेच देते हैं।"

मोनिका ने तुरंत कहा कि सच पूछो तो मेरे मन में यह बात पहले से ही आ रही थी। 

मैंने कहा कि लेकिन हम रहेंगे कहाँ। ऐसा करते हैं एक साथ किराए का मकान ले लेते हैं। 

मोनिका ने कहा, "अब हम अलग-अलग पेइंग गेस्ट की तरह रहेंगे। तुम पैसे की चिंता मत करो। मैं तुम्हारा पेइंग गेस्ट का ख़र्चा उठा लूँगी।" मुझे मोनिका की यह बात बड़ी अजीब सी लगी। पर मेरे पास इस समय मोनिका के पैसों पर निर्भर रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। नौकरी जाने के बात मुझे अपने घर बताने में डर लग रहा था। 

धीरे-धीरे छह महीने बीत गए। इस दौरान मैने काफ़ी कंपनियों के इंटरव्यू दिए पर मुझे कहीं से कोई रिस्पांस नहीं मिला। एक दिन मोनिका ने मुझसे कहा, "विनय तुम्हें अब अपना कोई और इंतज़ाम करना होगा। क्योंकि मेरा परिवार बेंगलुरु में शिफ़्ट हो रहा है । और 
धीरे-धीरे मेरे अपने ख़र्चे भी बढ़ते जा रहे हैं। मैं अधिक से अधिक एक महीने तक तुम्हारा ख़र्चा उठा सकती हूँ।”

मुझे लगा शायद मोनिका ने ठीक ही कहा। उस दिन शाम को मैं एक कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में टीचर की हैसियत से इंटरव्यू देने के लिए गया। मुझे 10000/- प्रतिमाह पर कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में इंस्ट्रक्टर की नौकरी मिल गई। कहाँ इतना हैवी सैलरी पैकेज और कहाँ 10000/- पर माह! पर मुझे रहने-करने के लिए कुछ तो करना ही था। मैंने बेंगलुरु में एक छोटा सा रूम किराए पर लिया और अपना जीवन बसर करने लगा। पर इस बीच मैं लगातार इंटरव्यू देता रहा। पर मुझे कोई उत्तर नहीं मिला। धीरे-धीरे एक साल बीत गया। इन दिनों में मोनिका से मेरी बातचीत बहुत कम हो गयी। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि समय के साथ मोनिका इतनी बदल जाएगी। 

थोड़ी सी सफलता ने मेरा दिमाग़ ख़राब कर दिया था। मैं शायद ज़िंदगी जीने के मायने भूल गया था। एक शाम ऐसे ही मैं कंप्यूटर इंस्टिट्यूट से आकर घर पर लेटा था तभी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। मैंने उठकर दरवाज़ा खोला तो पाया मोनिका खड़ी थी। 
मैंने उसे अंदर बुलाया। 

उसने आते ही पूछा कि अभी कोई नौकरी मिली कि नहीं?

"कहाँ!” मैंने कहा, “अभी नहीं संघर्ष जारी है।”

मोनिका ने कहा, "यही ज़िंदगी है अगर तुम रुक जाते हो तो तुमको छोड़कर सब आगे चले जाते हैं। कोई तुम्हारा रुककर इंतज़ार नहीं करेगा। "

मैंने कहा, "शायद तुम ठीक कह रही हो।" 

मोनिका ने अपने बैग से एक कार्ड निकाला और मुझे देते हुए बोली, "मेरी शादी का कार्ड है। अगले महीने मैं और सुधीर शादी करने जा रहे हैं।" इतना कहकर बिना कोई उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना वह कमरे से बाहर निकल गई। मुझे यह अफ़सोस नहीं हो रहा था 
कि मोनिका शादी कर रही है। मुझे यह ख़राब लग रहा था कि सुधीर के साथ। उस दिन मुझे एहसास हुआ शायद वाकई मैं इस ज़माने के लायक़ नहीं। लोग भाग रहे हैं और मैं काफ़ी पीछे रह गया हूँ। उस दिन मेरा हौसला इतना टूट गया कि मैं मोनिका और सुधीर की शादी के अगले दिन अपना सामान पैक करके सदा-सदा के लिए बेंगलुरु से बनारस को रवाना हो गया । 

मैं बनारस लौट कर बड़ा गुमसुम रहने लगा। मम्मी ने हमसे कुछ नहीं पूछा। एक दिन जब मैं छत पर टहल रहा था तो पापा पीछे से आए और प्यार से मेरे कंधे पर हाथ रख दिया और पूछा, "बेटा क्या बात है। जब से बेंगलुरु से आए हो काफ़ी उदास हो।" बस इतनी सी बात थी कि मैं रो पड़ा। 

मैंने कहा, "पापा नौकरी छूट गई।” 

पापा ने कहा, "इसमें परेशान होने वाली क्या बात है, मैं ज़िंदा हूँ। तुम्हें हमें पहले बताना चाहिए था और अब तुम्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें किसी से परेशान होने की भी ज़रूरत नहीं है कि लोग क्या कहेंगे? बेटा ज़िंदगी में ऐसे उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। मैं तो ख़ुश हूँ तुम्हें इसका अनुभव बहुत जल्द हो गया। अब तुम हायर एजुकेशन की तैयारी करो।"

मैंने कहा कि पापा मैं अब एमबीए की तैयारी करना चाहता हूँ। पापा ने कहा कि बिल्कुल ठीक, जब तक चाहो तब तक तैयारी कर सकते हो। 

मुझे इस सदमे से उबरने में थोड़ा वक़्त लग गया। कड़ी मेहनत के बाद मेरा सलेक्शन आईआईएम अहमदाबाद में हो गया। मैंने एम.बी.ए. की डिग्री वहाँ से हासिल की और मुझे दिल्ली में एक बहुत अच्छी नौकरी मिल गई। पर इस बार मेरे व्यवहार में काफ़ी परिवर्तन आ गया था। मैंने अपनी नौकरी में कड़ी मेहनत की और लगभग दस साल बाद उस कंपनी का सीईओ नियुक्त हुआ।
 
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। एक दिन मैंने अपने सेक्रेटरी मलिक को बुलाया और कहा, "मलिक तुम्हें पता है बेंगलुरु की दो कंपनियों को हमारी कंपनी ने टेकओवर कर लिया है। मैं चाहता हूँ कि उनमें से हम कुछ इंप्लाई को रखकर बाक़ी सब को नौकरी से निकाल दें। इसलिए मैं उस कंपनी के इंप्लाईज़ के साथ एक फ़ाइनल मीटिंग करना चाहता हूँ।" 

मलिक ने कहा कि ठीक है सर, कल हम बेंगलुरु के लिए रवाना हो जाएँगे। मैं कंपनी को सूचना भिजवा देता हूँ। दूसरे दिन जैसे ही विनय ने उस कंपनी के कांफ्रेंस रूम में प्रवेश किया, उसके प्रवेश करते ही सारे इंप्लोईज़ खड़े हो गए। विनय कुर्सी पर बैठ गया। सबसे पहले उसकी नज़र सुधीर और मोनिका से जा मिली। नज़र मिलते ही सुधीर और मोनिका ने अपने चेहरे को नीचा कर लिया। विनय ने कहा, "आप सब को तो पता है कि आपकी कंपनी को हमारी कंपनी ने टेकओवर कर लिया है। अब हमें सारे इंप्लोईज़ की ज़रूरत नहीं है। नौकरी से निकाले गए इंप्लोईज़ की लिस्ट आपके कंपनी के गेट पर शुक्रवार को चिपका दी जाएगी दो महीने की सैलरी के एडवांस के साथ। अब आपको कंपनी में आने की ज़रूरत नहीं है।" 

मैं और मलिक वापस दिल्ली लौट आए। मलिक और मैं मिलकर लिस्ट फ़ाइनल कर रहे थे कि मलिक ने कहा, "मैंने सारे इंप्लोईज़ का इंटरव्यू लिया है इनमें से दो इंप्लोई सुधीर और मोनिका पति पत्नी है। मेरे सुझाव से दोनों में से एक को ही नौकरी से निकालना चाहिए।" 

मैंने कहा, "मलिक तुम ठीक कह रहे हो। तुम्हें कौन सही लग रहा है?”

मलिक बोला कि मोनिका को नौकरी पर रख लेना चाहिए सुधीर को निकालते हैं। मोनिका औरत है अब इस उम्र में कहाँ नौकरी के लिए दौड़ेगी-भागेगी। सुधीर मर्द है दूसरी नौकरी उसे आसानी से मिल जाएगी। 

मैंने अपनी आँखें मूँद लीं और बोला, "मलिक ऐसा करो मोनिका को नौकरी से निकाल दो।"

मलिक बोला, "क्यों सर क्या आप सुधीर को जानते हैं?" 

मैंने उत्तर दिया, “नहीं मैं मोनिका को पहचानता हूँ।"

मैंने मन ही मन सोचा कि मैं चाहता तो दोनों को नौकरी से निकाल देता पर मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि एक समय मोनिका और सुधीर की वजह से मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली थी।

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