01-03-2019

वर्तमान संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास की प्रासंगिकता

अतुल कुमार लाल

 गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल की सगुण भक्ति के राम काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे प्रकाण्ड विद्वान, उच्च कोटि के रचनाकार, परम भक्त, दर्शन और धर्म के सूक्ष्म व्याख्याता, सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतिष्ठाता, बहुभाषाविद्, आदर्शवादी भविष्यदृष्ट्रा, विश्व-प्रेम के पोषक, भारतीयता के संरक्षक, लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण तथा अद्भुत समन्वयकारी थे। आलोचक रमेश कुंतल मेघ की वस्तुनिष्ठ टिप्पणी तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व को रेखांकित करती है- “जब वे समाज के पूरे रंगमंच को देखते-देखते तथा भोगते-भोगते यथार्थवादी एवं व्यावहारिक भी हो जाते हैं (दोहावली, कवितावली, हनुमानबाहुकादि) तब वे कलिकाल की गर्दन मरोड़ देते हैं। अपने जीवन के परवर्ती चरण में तुलसी आध्यात्मिक और स्वप्नद्रष्टा के बजाय धार्मिक और यथार्थ द्रष्टा हुए हैं। उन्होंने अंतत: घोषित ही किया की सारे समाज तंत्र का आधार ‘पेट' अर्थात् आर्थिक शक्ति है (कवितावाली)। यह उनके समाज दर्शन की महत्तम सिद्धि है जो उन्हें कबीर तक से बहुत आगे ले जा सकती है। आर्थिक दरिद्रता को इतना भोगने-समझने वाला मनुष्य, दरिद्रता के सामाजिक परिणामों को इतना सटीक विश्लेषित करने वाला समाज-पुरुष और दरिद्रता से इतनी प्रगाढ़ नफरत करने वाला लोककवि, तुलसी के अलावा कोई नहीं है।”1 

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने तुलसीदास कृत ग्रंथों को उल्लेख किया है, वे निम्नलिखित हैं- १. रामचरितमानस २. रामललानहछू ३. वैराग्य-संदीपनी ४. बरवै रामायण ५. पार्वती-मंगल ६. जानकी-मंगल ७. रामाज्ञाप्रश्न ८. दोहावली ९. कवितावली १०. गीतावली ११. श्रीकृष्ण-गीतावली १२. विनयपत्रिका १३. सतसई १४. छंदावली रामायण १५. कुंडलिया रामायण १६. राम शलाका १७. संकट मोचन १८. करखा रामायण १९. रोला रामायण २०. झूलना २१. छप्पय रामायण २२. कवित्त रामायण २३. कलिधर्माधर्म निरुपण आदि हैं। नागरी प्रचारिणी सभा काशी, एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एंड एथिक्स में ग्रियर्सन महोदय और अन्य कई विद्वानों ने उपरोक्त प्रथम बारह ग्रंथों का उल्लेख किया है और प्रमाणिक रचना माना है।

जो साहित्य हर समय प्रासंगिक हो वास्तव में वही चिरंतर, कालजयी व अमर साहित्य है। तुलसीदास की लोकप्रियता और प्रासंगिकता के केन्द्र में 'राम' हैं। उनकी भक्ति दास्य भाव की है। महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस सहित सभी ग्रंथों में समन्वय तथा सार्वभौम मानवता के सूत्र बिखरे पड़े हैं, जिनकी प्रासंगिकता उन दिनों भी थी आज भी है। तुलसीदास की प्रासंगिकता का सवाल साहित्य और समाज के संबंध का सवाल नहीं है। यह साहित्य की सामाजिक उपयोगिता का सवाल है। डॉ. ग्रियर्सन से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रेखांकित किया है कि तुलसीदास बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक हैं। एक सच्चा लोकनायक ही ज्ञान और भक्ति का, शील, शक्ति और सौन्दर्य का, सगुण और निर्गुण का, व्यक्ति और समाज का, धर्म और संस्कृति का, राजा और प्रजा का, वेद और व्यवहार का, विचार और संस्कार का समन्वय कर सकता है। लोकनायक वह होता है जो समन्वय कर सके और सबको साथ लेकर चल सके।

लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास सिर्फ़ कवि ही नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के अग्रदूत थे। अपनी कालजयी रचना श्री रामचरितमानस से उन्होंने समाज को जोड़ने का कार्य किया है। वर्तमान में भारत एक विखंडित समाज बन गया है। इसमें ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, शासक-शासित का भेद बढ़ता ही जा रहा है। आज के विषम परिवेश में तुलसी कृत रामचरितमानस के अनुशीलन से अनेकता में एकता के तत्वों को पहचाना जा सकता है और विखंडित समाज को अखंड भारत के आदर्श से जोड़ा जा सकता है। समाज की वर्तमान स्थिति में राम की प्रासंगिकता पुनः दृष्टिगत हो रही है। रामचरितमानस के माध्यम से हमारे इस लोकप्रिय कवि का मूल उद्देश्य सामाजिक जीवन में उन मान्यताओं, मर्यादाओं एवं मूल्यों को स्थापित करना है जिनसे समाज का मंगल हो तथा वह समृद्धिशाली शक्तिशाली बने। रामचरितमानस में तुलसी ने रामराज्य की कल्पना की और राम के रूप में राजा का आदर्श सामने रखा। इस राम के राज्य में लोग दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त होंगे, तभी वह ‘रामराज्य’ कहलाएगा। 'रामचरितमानस' में जीवन मूल्यों का क्षेत्र सीमित नहीं है। उनमें वैश्विक दृष्टि है। मानव मात्र के कल्याण की कामना है। जीवन मूल्य स्थान, काल के बंधनों से मुक्त स्वस्थ समाज एवं कल्याणकारी राजनीति की स्थापना में सहायक एवं मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। तुलसी के यहाँ भक्ति का मतलब अपनी आँखें मूँदकर भगवान के पीछे चल देना नहीं है। उनकी भक्ति पहले भगवान को अपनी कसौटी पर कसती है, जाँचती है, परखती है और तब अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में सौंपती है। तुलसी के मापदंड पर भगवान भी तभी भगवान हैं, जब वे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ हैं। रामचरितमानस में उन्होंने अपने समय में शासक या शासन पर सीधे कोई प्रहार नहीं किया। लेकिन सामान्य रूप से उन्होंने शासकों को कोसा है, जिनके राज्य में प्रजा दु:खी रहती है, अयोध्याकांड  में लिखते हैं–

'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
सोई नृप अवसि नरक अधिकारी।' 

अर्थात् जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी है, अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रही है, वह राजा निश्चय ही नरक का अधिकारी है। तुलसी की यह पंक्तियाँ आज के शासक वर्ग को पूरे मनोयोग से पढ़ने और समझने की आवश्यकता है। यह सही है कि तुलसी दास ने जिस समय रामचरित मानस की रचना की उस समय भारत की दशा अत्यंत दयनीय थी, विदेशी शासकों द्वारा निर्दोष जनता पर अत्याचार किये जा रहे थे और भारत की भूमि आक्रमणकारियों के दमन से त्रस्त थी। तुलसी ने इस विषम परिस्थिति में रामचरित मानस लिखकर इस प्रकार ज्योति फैलाई कि न केवल अपने समय में बल्कि बाद के सालों में आज भी वह भारतीय संस्कृति का संरक्षक बना है।

     'रामचरितमानस' में धार्मिक-दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों का निरूपण सुंदर ढंग से हुआ है। धर्म का उद्देश्य है मनुष्य को शुभत्व एवं शिवत्व की राह दिखा कर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर कराना। इसके लिए तप और त्याग आवश्यक है। तप की महत्ता बतानेवाली अनेक उक्तियाँ 'रामचरितमानस' में मिलती हैं-  

तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा,  (१/७३)
तप के अगम न कछु संसारा। (१/१६३)

तुलसीदास जी ने तप का महत्त्व निरूपित करने के लिए ही वाल्मीकि, अत्रि, भरद्वाज, नारद आदि को तपस्यालीन चित्रित किया है। चक्रवर्ती होने वाले राम वनवासी हो जाते हैं। लक्ष्मण अपने दाम्पत्य सुख की बलि देकर भ्रातृसेवा का त्यागदीप्त जीवनमार्ग अपनाता है और भरत महल में प्राप्त राज्य में लक्ष्मी को तृणवत् मानकर भाई को ढूँढ़ने निकल पड़ता है। तुलसीदास ने देखा कि अपने युग में जनता पारस्परिक कलह, ईर्ष्या, द्वेष और अधर्म में फँसी हुई है। पति-पत्नी, भाई-भाई, राजा-प्रजा, परिवार-कुटुम्ब में छोटी-मोटी बातों पर कलह-विवाद ओर संघर्ष हो रहे हैं। 'तुलसीदासः आज के संदर्भ में' - पुस्तक में युगेश्वर जी ने उचित ही कहा है कि राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए जिस उदात्त चरित्र की आवश्यकता है, वह रामकथा में है। मानस एक ऐसा वाग्द्वार है जहाँ समस्त भारतीय साधना और ज्ञान परम्परा प्रत्यक्ष दीख पड़ती है। दूसरी ओर देशकाल से परेशान, दुःखी और टूटे मनों का सहारा तथा संदेश देने की अद्भुत क्षमता है। आज भी करोड़ों मनों का यह सहारा है। 'रामचरितमानस' के संदेश को केवल भारत तक सीमित स्वीकृत करना इस महान् ग्रंथ के साथ अन्याय होगा। 'रामचरितमानस' युगवाणी है। विश्व का एक ऐसा विशिष्ट महाकाव्य जो आधुनिक काल में भी ऊर्ध्वगामी जीवनदृष्टि एवं व्यवहारधर्म तथा विश्वधर्म का पैग़ाम देता है। 'रामचरितमानस' अनुभवजन्य ज्ञान का 'अमरकोश' है।

   जहाँ तुलसीदास की दोहावली, कवितावली, गीतावली, कृष्णगीतावली, बरवैरामायण, विनयपत्रिका जैसी रचनाएँ मुक्तक काव्य का मनोहर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, वहीं रामचरितमानस महाकाव्य का अन्यतम उदहारण है। रामललानहछू, जानकीमंगल और पार्वतीमंगल कृतियाँ खंड काव्य के अंतर्गत आती हैं। जानकीमंगल में राम-सीता के विवाह, पार्वती मंगल में शिव-पार्वती के विवाह, रामललानहछू में राम के यज्ञोपवीत संस्कार का वर्णन है। कलिकाल के बहाने से तुलसी कवितावली और विनयपत्रिका में बाह्य समाज में व्याप्त लोभ, लिप्सा, ईर्ष्या-द्वेष, शोषण, भूख, बेकारी, अकाल सामाजिक अराजकता, सांस्कृतिक अपदूषण, सामंती वर्ग की मनमानी, कट्टरपंथी धर्मावलम्बियों के वर्णन के साथ तुलसी के अंतर्मन और तन की पीड़ा का उल्लेख किया है। तुलसी के कृतित्व के दूसरे चरण को मैनेजर पाण्डेय ने तुलसी के काव्य का दूसरा पक्ष कहा है – “जिसके आगे पीछे कोई शास्त्र नहीं है। वहाँ लोकजीवन का व्यापक अनुभव है, उनका अपना चिंतन है और गहरी सहृदयता है। यह सब रामचरित मानस में भी है, विशेषतः उसके मानवीय संबंधों के चित्रण, कथा के रचना-विधान और काव्यभाषा की बनावट में। परन्तु उनकी गंभीर चिन्तनशीलता और सहृदयता के एक से बढ़कर एक उदाहरण विनयपत्रिका में मिलते हैं...कवितावली के आत्मकथात्मक छंदों में अपने जीवन और समाज के कठोर सच को सीधे कहने की तत्परता है तो दूसरे अनेक छंदों में उस समय के समाज के यथार्थ का मर्मस्पर्शी चित्रण भी है। उन्होंने समाज में फैली ग़रीबी, भुखमरी, अकाल और महामारी के त्रासद यथार्थ का जो वर्णन किया है, उसमें उनकी जनजीवन से गहरी आत्मीयता और व्यापक करुणा व्यक्त हुई है। तुलसीदास के काव्य का यह पक्ष शास्त्र से मुक्त एवम लोक अनुभव से प्रेरित है।”2 अतः गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएँ कला की अमर देन है जिसका गहरा प्रभाव किसी क्षेत्र-विशेष या सीमित काल पर नहीं बल्कि सार्वभौम तथा सर्वकालीन है। 

 संदर्भ सूची 

1. मेघ, रमेश कुंतल (1967), तुलसी: आधुनिक वातायन से, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-116
2. पाण्डेय, मैनेजर (2011) ,“भक्ति काव्य और हिंदी आलोचना”,’ संकलित निबंध, संपा० मधुरेश, नयी दिल्ली, नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ सं.-18

अतुल कुमार लाल

पार्ट टाइम शिक्षक
नानी भट्टाचार्या स्मारक महाविदयालय
जयगांव (उत्तर बंग) 
 संपर्क नंबर  – 8167370301
ई-मेल- lal.atul12345@gmail.com 

                                      
                   

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